रविवार, 24 अक्तूबर 2010

सैर

 
सुबह-सवेरे
आँखें मींचते हुए
उठते,
अंगड़ाई लेते
मेरे मन ने
जिद शुरू की मुझसे
कि
मुझे आज....
अभी... जंगल घूमने जाना है....
वहां...
जहाँ
घने पेड़ों की छांह में
फुरसत के दिन सोते हैं....
घनी झाड़ियों से
बिसरे दिन शावक की तरह कूदकर
सिरहाने लग जाते हैं....
छोटे-छोटे पौधों के बीच
हंसी-मुस्कुराहट
आँख-मिचौली करती  हैं....
कहीं-कहीं बीच में उगी
घास के  सूखे तिनके
बीती कंटीली बातों की तरह चुभते
और
ज़िंदा होने का अहसास दिलाते हैं.......
वहां
जाने की अकुलाहट में
ठूंठ से लम्बे दिन की दस्तक को
अनसुना कर
घर के
पीछे के दरवाज़े से
मैं निकल गया लम्बी सैर को.....
ऐसी सैर को
जिसमे लौटने का समय तय नहीं...
सैर की दूरी तय नहीं
ठीक वैसे ही जैसे
किसी बीज को
पता नहीं होता है
 कि
अंकुरण के बाद वो
दुनिया को
कितना अपनी शाखों-प्रशाखाओं से
छू पायेगा....
महसूस कर पायेगा...
आखिर
एक बरगद का
घना-पुराना वृक्ष भी
तो
नहीं जानता अपनी इस सैर के बारे में .....
पर
फिर भी
मन में सवाल आता है
कि
क्या तुम जानते ह़ो इस सवाल का जवाब???
इस सवाल का जवाब
इतना ही आसान होता
अगर
सूरज को पता होता
अपने उगने और ढलने का
अंतिम दिन.......
बादलों को पता होता
अपना आखिरी पड़ाव....
समुंदर को पता होता
अपनी लहरों से जुदाई का आखिर लम्हा......
प्रकृति को पता होता
अपने जादू का अंतिम प्रभाव........
सच!!!
तब
मन का
पक्का ठौर-ठिकाना होता
जाने-पहचाने
अपनाये तौर-तरीके होते...
बरखा-बसंत
शरद-ग्रीष्म के लुभावने रंग
घर के किसी कोने में
धूल खा रहे होते
और
मैं
बिस्तर में
गहरी नींद में
बार-बार
पुराने ह़ो चुके सपनों से
खेल रहा होता.........
 
 

1 टिप्पणी:

TRIPURARI ने कहा…

Such a philosophical poem !