शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

याद

खामोश..वीरान शाम के सीने से

अपनी पकड़ छुड़ा

बदहवास

जंज़ीरें तोड़ती

हाथ छुड़ाती

भागती चली आती

समा जाती देह की पोर-पोर में

मन के कोलाहल को घोले

रिसती आँखों के रास्ते

खट्टी-मीठी, कड़वी-फीकी

नमकीन-कुरकुरे स्वाद में.........

........................तुम्हारी याद!!!

5 टिप्‍पणियां:

Sunil Kumar ने कहा…

सुंदर भावाव्यक्ति अच्छी लगी

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

अर्पिता जी
बहुत ख़ूब !
सुंदर शब्द-विन्यास के साथ, एक ही वाक्य में इतनी ख़ूबसूरत कविता के अनोखे प्रयोग के लिए बधाई !


शुभकामनाओं सहित
- राजेन्द्र स्वर्णकार

राकेश कौशिक ने कहा…

बहुत खूब

अनुपमा पाठक ने कहा…

याद का यूँ समा जाना!
वाह!

लीना मल्होत्रा ने कहा…

arpita aapko aur likhna chahiye aapki rachnaao me ek nishchalta hai ek pukar hai jo seedha man se nikli hai aur man tak pahunchi hai. yahi sampreshan hota hai. bahut badhai. mujhe aapka blog bahut achha laga. meri shubhkamnaye aapke liye.